मेरी सुबह चाय के साथ | पहला ब्लॉग | Tej Journal
नमस्ते! मैं हूँ तेज।
काफ़ी समय से सोच रहा था कि अपनी लाइफ में कुछ बड़ा करूँगा, पर कर नहीं पाया। एक आम सा लड़का बनकर रह गया। लेकिन आज कुछ अलग सोच सूझी—क्यों न अपने जैसे लोगों से जुड़ा जाए, जो मेरी तरह घर पर रहकर खेती करते हैं?
हाँ, मैं खेती करता हूँ अपने पापा के साथ मिलकर। सुबह से लेकर शाम तक खेत में काम करता हूँ और शाम को कुछ नया करने की सोचूँ, उससे पहले ही नींद आ जाती है। पर आज कुछ लिख रहा हूँ—अपनी ब्लॉग वेबसाइट पर, जहाँ मैं रोज़ अपनी लाइफ के बारे में लिखूँगा ताकि मेरा मन हल्का हो सके।
मेरे हिसाब से, जब आप कामयाब नहीं होते, तो ज्यादातर लोग आपसे जुड़ नहीं पाते। मैं वही ‘आम सा लड़का’ हूँ जिसने ग्रेजुएशन के बाद भी खेती जारी रखी, क्योंकि जॉब मिली नहीं और जो है उसी को कंटिन्यू करना पड़ रहा है। ये कोई कहानी नहीं, बस मेरी ज़िंदगी में अभी यही हो रहा है।
आज का दिन काफी अच्छा शुरू हुआ।
हल्की धूप, हल्की ठंड… गाँव की सुबह का तो अपना ही मज़ा है। जब मैं शहर में रहता था, तो ना पता चलता था कब सुबह हुई और कब शाम।
अब गाँव में रहकर, माँ की हल्की सी आवाज़ के साथ नींद खुलती है और पापा के साथ दो रोटी खाकर शाम हो जाती है। भाग-दौड़ वाली लाइफ में लग रहा है कि मेरी ज़िंदगी यहाँ अच्छे से चल रही है… क्या पता?
जैसे ही नींद खुली, हाथ में चाय का कप आ गया।
कड़क चाय के साथ दिन की शुरुआत बेमिसाल हो जाती है। मेरे लिए तो चाय ही चाय है—इसके बिना ना दिन चलता है, ना रात।
आज दो महत्वपूर्ण काम थे:
आम के पेड़ों को खाद देना
गन्ने के खेत की कटाई शुरू करवाना
पहले मैंने आम के खेत में पूरी तरह खाद डलवा दी।
जब भी मैं उदास या बेचैन रहता हूँ, ये आम के पेड़ मेरा सहारा बनते हैं। इनके बीच अकेले खड़ा रहना बहुत अच्छा लगता है। दोपहर तक आम के पेड़ों को खाद और दवाई दे दी।
फिर जाना था गन्ने के खेत में।
जैसे ही वहाँ पहुँचा, मेरे पहुँचने से पहले ही कटाई शुरू हो चुकी थी।
पर असली दिक्कत कुछ और थी—कटे हुए गन्ने को फैक्ट्री तक ले जाने के लिए जो रास्ता है, वो खराब पड़ा था। खेत से मेन रोड तक रास्ता ठीक ना होने की वजह से हमें ही उसे बनवाना पड़ता है।“और आपको तो पता ही है, हमारे यहाँ की सड़कें स्पेस टेक्नोलॉजी से बनी है।—इसलिए उन्हें भी हमें ही ठीक करवाना पड़ता है।”
खैर, कोई बात नहीं—JCB बुलाकर हमने ही रास्ता तैयार करवा लिया, ताकि हमारा गन्ना सही सलामत फैक्ट्री तक पहुँच सके।
दिन भर का काम ऐसे ही चलता रहता है।
एक काम खत्म नहीं होता कि दूसरा हाज़िर हो जाता है। खेती में ना छुट्टी मिलती है, ना आराम। बस दौड़ते रहो… बस यही रही आज के दिन की पूरी कहानी . “चलो, मिलते हैं कल के ब्लॉग में। अलविदा…
- बातें तो होती ही रहेंगी।”
_ Tej Journal.